देहरादून। उत्तराखंड की सबसे महत्वाकांक्षी और लंबे समय से लंबित बहुउद्देशीय परियोजनाओं में शामिल किशाऊ बांध परियोजना एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा परियोजना को लेकर उच्चस्तरीय बैठक किए जाने की खबरों के बाद राज्य में इस परियोजना को लेकर नई उम्मीदें जगी हैं। वर्षों से फाइलों, अंतरराज्यीय सहमतियों, पर्यावरणीय मंजूरियों और वित्तीय प्रक्रियाओं के बीच अटकी यह परियोजना यदि गति पकड़ती है तो इसका प्रभाव केवल उत्तराखंड ही नहीं बल्कि उत्तर भारत के कई राज्यों पर पड़ सकता है।
आखिर क्या है किशाऊ बांध परियोजना?
किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना टौंस नदी पर प्रस्तावित है, जो यमुना की प्रमुख सहायक नदी है। यह परियोजना उत्तराखंड के देहरादून और हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले की सीमा पर विकसित की जानी है। परियोजना में एक विशाल कंक्रीट ग्रेविटी बांध के निर्माण का प्रस्ताव है, जिससे जल भंडारण, बिजली उत्पादन और सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध कराया जा सकेगा।
परियोजना के तहत सैकड़ों मेगावाट जलविद्युत उत्पादन के साथ-साथ यमुना बेसिन से जुड़े राज्यों को अतिरिक्त जल उपलब्ध कराने की भी योजना है। इसके लाभार्थी राज्यों में उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली शामिल हैं।
क्यों महत्वपूर्ण है यह परियोजना?
उत्तराखंड में लंबे समय से यह तर्क दिया जाता रहा है कि राज्य की पर्वतीय नदियां देश की अर्थव्यवस्था और जल सुरक्षा में महत्वपूर्ण योगदान देती हैं, लेकिन इसके अनुपात में राज्य को लाभ नहीं मिल पाता। किशाऊ परियोजना को इस दृष्टि से एक रणनीतिक परियोजना माना जाता है।
विशेषज्ञों के अनुसार इस परियोजना के तीन प्रमुख आयाम हैं:
1. ऊर्जा सुरक्षा
परियोजना से बड़े पैमाने पर जलविद्युत उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है। उत्तराखंड पहले से ही जलविद्युत क्षमता के लिए जाना जाता है और किशाऊ परियोजना इस क्षमता को और बढ़ा सकती है।
2. सिंचाई और जल प्रबंधन
यमुना बेसिन के राज्यों में बढ़ती जल मांग को देखते हुए यह परियोजना भविष्य की जल सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है। परियोजना से लाखों हेक्टेयर कृषि भूमि को सिंचाई सुविधा मिलने की संभावना व्यक्त की गई है।
3. राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र को लाभ
परियोजना के समर्थकों का कहना है कि दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों की दीर्घकालिक पेयजल आवश्यकताओं को पूरा करने में भी यह परियोजना महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
30 वर्षों से अधिक पुराना सपना
किशाऊ परियोजना नई नहीं है। इस परियोजना पर चर्चा कई दशकों से चल रही है। विभिन्न सरकारों ने समय-समय पर इसे आगे बढ़ाने की कोशिश की, लेकिन राज्यों के बीच जल बंटवारे, वित्तीय हिस्सेदारी, पर्यावरणीय मंजूरियों और पुनर्वास जैसे मुद्दों के कारण परियोजना लगातार विलंबित होती रही।
वर्ष 2015 में उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के बीच संयुक्त उपक्रम को लेकर महत्वपूर्ण समझौता हुआ। इसके बाद 2017 में परियोजना के क्रियान्वयन के लिए किशाऊ कॉरपोरेशन लिमिटेड का गठन किया गया।
इसके बावजूद परियोजना जमीन पर अपेक्षित गति से आगे नहीं बढ़ सकी।
अमित शाह की बैठक क्यों महत्वपूर्ण?
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा इस परियोजना की समीक्षा किए जाने को राजनीतिक और प्रशासनिक दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
उत्तराखंड में लंबे समय से यह मांग उठती रही है कि राष्ट्रीय महत्व की परियोजनाओं में केंद्र सरकार को अधिक सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए। शाह की बैठक को इसी संदर्भ में देखा जा रहा है।
यदि केंद्र स्तर पर विभिन्न हितधारक राज्यों के बीच लंबित मुद्दों पर सहमति बनती है, तो परियोजना के निर्माण कार्य में तेजी आ सकती है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उत्तराखंड में आगामी वर्षों में बुनियादी ढांचे और जलविद्युत परियोजनाओं को विकास के प्रमुख एजेंडे के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है। ऐसे में किशाऊ परियोजना का आगे बढ़ना राज्य सरकार के लिए भी एक महत्वपूर्ण उपलब्धि साबित हो सकता है।
स्थानीय स्तर पर चिंताएं भी कम नहीं
हालांकि परियोजना के आर्थिक और रणनीतिक लाभों की चर्चा होती रही है, लेकिन इसके साथ कुछ गंभीर चिंताएं भी जुड़ी हुई हैं।
स्थानीय समुदायों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं का एक वर्ग लंबे समय से पुनर्वास, भूमि अधिग्रहण और पर्यावरणीय प्रभावों को लेकर सवाल उठाता रहा है।
हिमालयी क्षेत्र की संवेदनशील पारिस्थितिकी को देखते हुए विशेषज्ञों का मानना है कि परियोजना के क्रियान्वयन में पर्यावरणीय मानकों का सख्ती से पालन किया जाना चाहिए।
उत्तराखंड ने जोशीमठ, भूधंसाव और जलवायु परिवर्तन से जुड़ी चुनौतियों का अनुभव किया है। ऐसे में किसी भी बड़ी परियोजना को केवल आर्थिक दृष्टि से नहीं बल्कि पर्यावरणीय स्थिरता के आधार पर भी परखा जाएगा।
उत्तराखंड की राजनीति में भी रहेगा असर
किशाऊ परियोजना केवल एक इंजीनियरिंग परियोजना नहीं है। यह उत्तराखंड की विकास राजनीति का भी हिस्सा बन चुकी है।
एक ओर भाजपा इसे राज्य के बुनियादी ढांचे, ऊर्जा और जल संसाधनों के विकास से जोड़कर प्रस्तुत कर सकती है, वहीं विपक्ष पुनर्वास, पर्यावरण और स्थानीय हितों से जुड़े सवाल उठा सकता है।
इस कारण आने वाले समय में किशाऊ परियोजना केवल प्रशासनिक नहीं बल्कि राजनीतिक बहस का भी विषय बनने वाली है।
आगे क्या?
फिलहाल सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या अमित शाह की पहल के बाद वर्षों से लंबित यह परियोजना निर्णायक चरण में प्रवेश करेगी या फिर यह एक बार फिर प्रशासनिक प्रक्रियाओं में उलझ जाएगी।
उत्तराखंड के लिए यह परियोजना केवल एक बांध नहीं, बल्कि विकास, ऊर्जा, जल सुरक्षा और क्षेत्रीय हितों से जुड़ा एक बड़ा प्रश्न है। यदि सभी पक्षों के बीच सहमति बनती है और परियोजना आगे बढ़ती है, तो यह आने वाले वर्षों में उत्तराखंड की सबसे महत्वपूर्ण अवसंरचनात्मक परियोजनाओं में से एक साबित हो सकती है।
लेकिन इसके साथ यह भी सुनिश्चित करना होगा कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बना रहे, क्योंकि हिमालयी राज्यों के लिए यही सबसे बड़ी चुनौती है।
