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उत्तराखंड की राजनीति: धाकड़ धामी बनाम बिखरी कांग्रेस, क्या 2027 में भी कायम रहेगा भाजपा का दबदबा?

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देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति एक बार फिर नए समीकरणों और संभावित राजनीतिक संघर्षों के दौर में प्रवेश कर चुकी है। वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने इतिहास रचते हुए लगातार दूसरी बार सत्ता हासिल की थी। यह उपलब्धि इसलिए भी महत्वपूर्ण थी क्योंकि राज्य गठन के बाद पहली बार किसी पार्टी ने लगातार दूसरी बार पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाई। अब जबकि 2027 के विधानसभा चुनावों में लगभग डेढ़ वर्ष का समय शेष है, राज्य की राजनीति में कई नए प्रश्न उभर रहे हैं।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में भाजपा अपनी राजनीतिक बढ़त बनाए रख पाएगी, या कांग्रेस संगठनात्मक कमियों को दूर कर सत्ता में वापसी का रास्ता तैयार कर पाएगी?

2022 की जीत का आधार: हिंदू एकीकरण और नेतृत्व पर भरोसा

2022 के चुनाव में भाजपा की जीत केवल संगठनात्मक मजबूती का परिणाम नहीं थी। राज्य में सामान्य वर्ग, ओबीसी समुदायों और पहाड़ी अनुसूचित जाति मतदाताओं के एक बड़े हिस्से का भाजपा के पक्ष में शांत लेकिन प्रभावी ध्रुवीकरण देखने को मिला।
उस समय कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हरीश रावत को भाजपा ने सफलतापूर्वक मुस्लिम तुष्टिकरण से जोड़ने का प्रयास किया। चुनाव के अंतिम चरण में समान नागरिक संहिता (UCC) और कथित मुस्लिम विश्वविद्यालय जैसे मुद्दों ने भाजपा को विशेष रूप से पहाड़ी क्षेत्रों में हिंदू मतदाताओं के बीच अतिरिक्त समर्थन दिलाने में मदद की।

धामी का उदय: भाजपा को मिला नया चेहरा

2022 के चुनाव से पहले भाजपा को लगातार मुख्यमंत्री बदलने के कारण आलोचनाओं का सामना करना पड़ा था। त्रिवेंद्र सिंह रावत, तीरथ सिंह रावत और फिर पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व परिवर्तन ने विपक्ष को भाजपा पर हमला करने का अवसर दिया था।
हालांकि चुनाव के बाद धामी ने स्वयं को केवल एक संगठनात्मक समझौते के उम्मीदवार के बजाय एक स्वतंत्र राजनीतिक व्यक्तित्व के रूप में स्थापित किया।
आज राज्य में “धाकड़ धामी” की छवि भाजपा के लिए सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक संपत्तियों में से एक बन चुकी है। युवा, निर्णायक और सुलभ प्रशासक के रूप में उनकी छवि ने पार्टी के भीतर असंतोष को नियंत्रित रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
भाजपा के कई वरिष्ठ नेताओं के बीच संभावित प्रतिस्पर्धा के बावजूद धामी अब राज्य में पार्टी का निर्विवाद चेहरा बनकर उभरे हैं।

विकास और आस्था का मिश्रण

उत्तराखंड में भाजपा की राजनीति केवल संगठन और वैचारिक मुद्दों पर आधारित नहीं रही है। विकास परियोजनाओं को भी पार्टी ने अपनी राजनीतिक रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया है।
चारधाम ऑल वेदर रोड परियोजना, ऋषिकेश स्थित AIIMS, रेलवे और सड़क कनेक्टिविटी के विस्तार तथा तीर्थ स्थलों के पुनर्विकास को भाजपा लगातार अपनी उपलब्धियों के रूप में प्रस्तुत करती रही है।
विशेष रूप से केदारनाथ धाम के पुनर्निर्माण और पुनर्विकास ने भाजपा को एक ऐसा राजनीतिक नैरेटिव दिया जिसमें विकास और सांस्कृतिक पुनर्जागरण दोनों का समावेश दिखाई देता है।
राज्य के कई मतदाताओं के बीच यह धारणा बनी कि बड़े धार्मिक आयोजनों, तीर्थ यात्राओं और पर्यटन आधारित अर्थव्यवस्था के प्रभावी प्रबंधन के लिए भाजपा अधिक सक्षम विकल्प है।

कांग्रेस की चुनौतियां: मुद्दे हैं, लेकिन संदेश नहीं

उत्तराखंड कांग्रेस ने बेरोजगारी, महंगाई, पुरानी पेंशन योजना (OPS), भूमि कानून और प्रशासनिक फैसलों को लेकर सरकार को घेरने का प्रयास किया।
इन मुद्दों पर जनता के बीच कुछ स्तर पर असंतोष भी दिखाई देता है। विशेष रूप से सरकारी नौकरियों की तैयारी कर रहे युवाओं, कर्मचारियों और कुछ किसान समूहों के बीच सरकार के प्रति सवाल मौजूद हैं।
इसके बावजूद कांग्रेस इन मुद्दों को व्यापक जन आंदोलन में बदलने में सफल नहीं हो सकी।
इसका सबसे बड़ा कारण पार्टी के भीतर लगातार जारी गुटबाजी रही है।
हरीश रावत, प्रीतम सिंह, करण माहरा, यशपाल आर्य और अन्य नेताओं के बीच नेतृत्व को लेकर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष प्रतिस्पर्धा लंबे समय से दिखाई देती रही है। परिणामस्वरूप कांग्रेस सरकार विरोधी माहौल को अपने पक्ष में परिवर्तित करने में असफल रही।

मैदान बनाम पहाड़: अलग-अलग राजनीतिक वास्तविकताएं

उत्तराखंड की राजनीति को समझने के लिए यह जानना आवश्यक है कि राज्य में मैदान और पहाड़ की राजनीतिक प्राथमिकताएं अक्सर अलग होती हैं।
हरिद्वार और ऊधम सिंह नगर जैसे मैदानी जिलों में कांग्रेस ने अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन किया। इसके पीछे मुस्लिम और अनुसूचित जाति मतदाताओं का एकतरफा समर्थन तथा बहुजन समाज पार्टी के वोट आधार का कमजोर होना प्रमुख कारण रहा।
इसके अतिरिक्त कई क्षेत्रों में स्थानीय विधायकों के खिलाफ नाराजगी ने भी कांग्रेस को लाभ पहुंचाया।
वहीं दूसरी ओर पहाड़ी क्षेत्रों में भाजपा का प्रभाव अधिक मजबूत बना रहा। राष्ट्रवाद, धार्मिक पहचान, सैन्य परंपरा और केंद्र सरकार के साथ बेहतर समन्वय जैसे मुद्दों ने भाजपा को यहां बढ़त दिलाई।
यही कारण है कि उत्तराखंड की राजनीति में भाजपा को चुनौती देने के लिए कांग्रेस को केवल सरकार विरोधी मुद्दे उठाने से अधिक व्यापक रणनीति की आवश्यकता होगी।

गणेश गोदियाल: कांग्रेस का संभावित नया चेहरा?

उत्तराखंड कांग्रेस में यदि किसी नेता की स्वीकार्यता अपेक्षाकृत व्यापक मानी जा रही है तो वह गणेश गोदियाल हैं।
गोदियाल को पार्टी नेतृत्व का विश्वास प्राप्त है और उनकी छवि अपेक्षाकृत साफ-सुथरी तथा जमीन से जुड़े नेता की रही है।
दिलचस्प बात यह है कि वे स्वयं को सांस्कृतिक हिंदुत्व के विरोधी के रूप में नहीं बल्कि एक धार्मिक और पारंपरिक समाज से जुड़े नेता के रूप में प्रस्तुत करते हैं। इससे उन्हें कांग्रेस के पारंपरिक वोटरों के साथ-साथ कुछ तटस्थ मतदाताओं के बीच भी स्वीकार्यता मिल सकती है।
हालांकि अभी यह स्पष्ट नहीं है कि कांग्रेस आगामी चुनावों में उन्हें प्रमुख चेहरे के रूप में आगे बढ़ाएगी या नहीं।

बॉबी पंवार और क्षेत्रीय राजनीति का नया अध्याय

उत्तराखंड की राजनीति में पिछले कुछ वर्षों में बॉबी पंवार एक उभरते हुए नाम के रूप में सामने आए हैं।
युवा वर्ग और रोजगार से जुड़े आंदोलनों के माध्यम से उन्होंने विशेष रूप से गढ़वाल क्षेत्र में अपनी पहचान बनाई है।
उनका प्रभाव अभी राज्यव्यापी नहीं माना जाता, लेकिन गढ़वाल मंडल की कुछ सीटों पर वे भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए चुनौती बन सकते हैं।
इसी प्रकार उत्तराखंड क्रांति दल (UKD) भी सीमित क्षेत्रों में अपनी उपस्थिति बनाए हुए है।
इन दोनों शक्तियों की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका यह हो सकती है कि वे सीधे जीत भले न हासिल करें, लेकिन कई सीटों पर मुख्य दलों के वोटों में सेंध लगाकर परिणामों को प्रभावित कर सकते हैं।
विशेष रूप से गढ़वाल क्षेत्र में यह प्रभाव अधिक दिखाई देने की संभावना है, जबकि कुमाऊं में इनकी पकड़ अभी सीमित मानी जाती है।

2027 की ओर बढ़ता उत्तराखंड

वर्तमान परिस्थितियों को देखें तो भाजपा अभी भी राजनीतिक रूप से मजबूत स्थिति में दिखाई देती है।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की लोकप्रियता, केंद्र सरकार के साथ समन्वय, हिंदुत्व आधारित वैचारिक समर्थन और अपेक्षाकृत मजबूत संगठन भाजपा की सबसे बड़ी ताकत हैं।
वहीं कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने संगठन को एकजुट करना और मतदाताओं को यह विश्वास दिलाना है कि वह एक विश्वसनीय विकल्प बन सकती है।
राजनीति में परिस्थितियां तेजी से बदलती हैं और चुनाव अभी दूर हैं। बेरोजगारी, पलायन, भूमि कानून, पर्यावरणीय चुनौतियां और स्थानीय असंतोष जैसे मुद्दे भविष्य में राजनीतिक विमर्श का केंद्र बन सकते हैं।
लेकिन फिलहाल उत्तराखंड की राजनीति का सबसे बड़ा निष्कर्ष यही है कि भाजपा एक स्पष्ट नेतृत्व और संगठित रणनीति के साथ मैदान में दिखाई देती है, जबकि कांग्रेस अभी भी अपने भीतर की लड़ाई से पूरी तरह बाहर नहीं निकल पाई है।
2027 का चुनाव केवल सरकार और विपक्ष के बीच मुकाबला नहीं होगा, बल्कि यह नेतृत्व, संगठन और राजनीतिक विश्वसनीयता की भी परीक्षा होगा। वर्तमान परिस्थितियों में बढ़त भाजपा के पास है, लेकिन उत्तराखंड की राजनीति हमेशा से अप्रत्याशित रही है और यही इसकी सबसे बड़ी विशेषता भी है।