उत्तराखंड के 1,320 मेगावाट थर्मल पावर प्रोजेक्ट आवंटन को लेकर शुरू हुए राजनीतिक विवाद पर राज्य सरकार ने अपनी स्थिति स्पष्ट की है। प्रमुख सचिव (ऊर्जा) आर. मीनाक्षी सुंदरम ने कांग्रेस द्वारा टेंडर शर्तों में फेरबदल के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि परियोजना का आवंटन नियमसंगत और पारदर्शी प्रतिस्पर्धी बोली प्रक्रिया के जरिए किया गया है।
इससे पहले, अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के राष्ट्रीय प्रवक्ता पवन खेड़ा ने नई दिल्ली स्थित पार्टी मुख्यालय में पत्रकार वार्ता कर राज्य सरकार पर गंभीर आरोप लगाए थे। खेड़ा ने दावा किया कि अडानी पावर को लाभ पहुंचाने के लिए टेंडर की 86 में से 84 शर्तों में बदलाव किया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि पूर्व में राज्य के उपक्रम उत्तराखंड जल विद्युत निगम लिमिटेड (UJVNL) और टीएचडीसी (THDC) के संयुक्त उद्यम के तहत परियोजना स्थापित करने का प्रस्ताव था, जिसे राज्य सरकार ने रोक दिया। कांग्रेस प्रवक्ता ने यह भी दावा किया कि 25 वर्ष के पावर परचेज एग्रीमेंट (PPA) से बिजली उपभोक्ताओं पर भारी वित्तीय बोझ पड़ सकता है।
कांग्रेस के इन आरोपों का खंडन करते हुए प्रमुख सचिव ऊर्जा सुंदरम ने स्पष्ट किया कि एनटीपीसी ने अपनी सहायक कंपनी टीएचडीसी को थर्मल पावर जेनरेशन की अनुमति नहीं दी थी, जिस कारण संयुक्त उद्यम का प्रस्ताव आगे नहीं बढ़ सका। इसके बाद पारदर्शी प्रक्रिया के तहत निजी कंपनियों से बोलियां आमंत्रित की गईं। उन्होंने 84 शर्तों में बदलाव के दावों को खारिज करते हुए कहा कि टेंडर में केवल पांच से छह आवश्यक तकनीकी संशोधन किए गए थे, जो भारत सरकार के दिशानिर्देशों के अनुरूप थे और जिन्हें उत्तराखंड विद्युत नियामक आयोग (UERC) से स्वीकृति मिली थी।
राज्य से बाहर संयंत्र स्थापित करने की अनुमति पर सरकार ने स्पष्ट किया कि टेंडर में स्थान की छूट इसलिए रखी गई थी ताकि कंपनियां ईंधन उपलब्धता और परिवहन लागत के आधार पर न्यूनतम बिजली दरें प्रस्तुत कर सकें। सुंदरम के अनुसार, बोली प्रक्रिया में पांच बड़ी कंपनियों ने हिस्सा लिया था और तीन कंपनियां वित्तीय बोली चरण तक पहुंची थीं, जिसमें न्यूनतम बोलीदाता को अनुबंध प्रदान किया गया।
स्रोत: www.dailypioneer.com · prashantnews.com




