केंद्र सरकार ने 20 जुलाई को लोकसभा में सुप्रीम कोर्ट (नंबर ऑफ जजेज) संशोधन विधेयक, 2026 पेश किया, जिसके तहत सर्वोच्च न्यायालय में मुख्य न्यायाधीश को छोड़कर न्यायाधीशों की संख्या 33 से बढ़ाकर 37 करने का प्रस्ताव है। विधेयक को कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने पेश किया। यह कदम लंबित मामलों की संख्या कम करने और न्याय वितरण की गति बढ़ाने के उद्देश्य से उठाया गया है, भारतीय प्रेस और संसदीय निगरानी संस्थाओं के अनुसार। (LiveLaw, PRS India)
हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, विधेयक पारित होने पर सुप्रीम कोर्ट की कुल स्वीकृत शक्ति 38 (मुख्य न्यायाधीश सहित) हो जाएगी। सरकार का तर्क है कि न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाना शीर्ष अदालत में लंबित मामलों से निपटने का व्यावहारिक उपाय है। (Hindustan Times)
इंडिया टुडे के अनुसार, सरकार ने बिल पेश करते समय यह भी रेखांकित किया कि सर्वोच्च न्यायालय में 92,101 मामले लंबित हैं; इस पृष्ठभूमि में जजों की संख्या बढ़ाने का प्रस्ताव आया है। रिपोर्ट में कहा गया कि यह विधेयक हाल में जारी अध्यादेश का स्थान लेगा और साधारण बहुमत से पारित किया जा सकता है। (India Today)
पीआरएस इंडिया के बिल-ट्रैकर के अनुसार, यह विधेयक 20 जुलाई, 2026 को लोकसभा में औपचारिक रूप से प्रस्तुत किया गया और इसका उद्देश्य 1956 के मूल कानून में संशोधन करना है। इससे पहले मई 2026 में इसी प्रभाव वाला एक अध्यादेश अधिसूचित हुआ था, जिसे अब संसद के माध्यम से कानून का रूप देने की प्रक्रिया शुरू हुई है। (PRS India; PRS-प्रकाशित अध्यादेश प्रति)
सरकार की ओर से प्रस्तुत प्रस्ताव में कहा गया है कि संविधान के अनुच्छेद 124 के तहत संसद को सुप्रीम कोर्ट के जजों की संख्या तय करने का अधिकार है। लोकसभा में पेश होने के बाद विधेयक पर चर्चा एवं पारित होने की प्रक्रिया तय कार्यक्रम के अनुसार आगे बढ़ेगी, जिसके पश्चात इसे राज्यसभा के समक्ष रखा जाएगा। (Hindustan Times, PRS India)
विधेयक की प्रस्तुति संसद के वर्तमान मानसून सत्र (20 जुलाई–13 अगस्त, 2026) के दौरान हुई, जिसमें सरकार ने न्यायिक एवं प्रशासनिक सुधारों से जुड़े अन्य विधायी कार्य भी सूचीबद्ध किए हैं। शीर्ष अदालत में न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने का यह प्रस्ताव समूचे देश, सहित उत्तराखंड के वादकारियों के लिए भी महत्वपूर्ण असर डाल सकता है, क्योंकि लंबित अपीलों के शीघ्र निस्तारण की अपेक्षा इससे जुड़ी है। (PRS India)
स्रोत: prsindia.org · www.livelaw.in · www.hindustantimes.com · www.indiatoday.in




