देहरादून: उत्तराखंड की राजनीति को गहराई से समझने के लिए केवल भाजपा और कांग्रेस के चुनावी अंकगणित को देखना काफी नहीं है। राज्य के राजनीतिक इतिहास में एक ऐसा नाम दर्ज है, जिसने उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलन को न सिर्फ वैचारिक दिशा दी, बल्कि सड़कों पर उतरकर इसे एक जनांदोलन में बदल दिया। यह नाम है, उत्तराखंड क्रांति दल (UKD)।
लेकिन आज एक बड़ी विडंबना राज्य के सामने खड़ी है। जिस दल ने अलग उत्तराखंड की लड़ाई का नेतृत्व किया, जिसने हजारों कार्यकर्ताओं को एकजुट कर ‘पहाड़’ की आवाज बुलंद की, वही पार्टी आज अपने ही बनाए राज्य की सियासत में हाशिए पर खड़ी है। 1979 में स्थापित UKD कभी पहाड़ी अस्मिता और क्षेत्रीय स्वाभिमान का सबसे बड़ा प्रतीक थी, लेकिन राज्य गठन के बाद वह धीरे-धीरे चुनावी राजनीति की मुख्यधारा से गायब होती चली गई।
आंदोलन की कोख से जन्म और शुरुआती महानायक
उत्तराखंड क्रांति दल का गठन 25 जुलाई 1979 को मसूरी में हुआ था। उस दौर में लखनऊ से संचालित होने वाली उत्तर प्रदेश की शासन व्यवस्था पर्वतीय क्षेत्रों की भौगोलिक, आर्थिक और सामाजिक चुनौतियों को समझने में पूरी तरह नाकाम साबित हो रही थी। सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और पलायन जैसे बुनियादी मुद्दों के बीच पहाड़ के लोगों में असंतोष गहरा रहा था। इसी असंतोष को संगठित राजनीतिक रूप देने के लिए UKD की नींव रखी गई।
इस आंदोलन को खड़ा करने में तीन प्रमुख स्तंभों की भूमिका सबसे अहम रही:
- इंद्रमणि बडोनी: जिन्हें “उत्तराखंड राज्य आंदोलन का जनक” कहा जाता है। बडोनी जी ने अलग राज्य की मांग को केवल एक राजनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और क्षेत्रीय पहचान के प्रश्न के रूप में प्रस्तुत किया। वे इस आंदोलन का सबसे सर्वमान्य चेहरा थे।
- बिपिन चंद्र त्रिपाठी: UKD के सबसे प्रभावशाली वैचारिक नेता। पर्यावरण, स्थानीय संसाधनों पर हक और एक विशेष पहाड़ी विकास मॉडल उनकी राजनीति के केंद्र में थे। वे मानते थे कि मैदानी राज्यों की नीतियां हिमालयी क्षेत्रों पर नहीं थोपी जा सकतीं।
- काशी सिंह ऐरी: चुनावी राजनीति में पार्टी का सबसे सफल चेहरा। उत्तर प्रदेश विधानसभा से लेकर उत्तराखंड गठन के बाद तक डीडीहाट और सीमांत कुमाऊं के क्षेत्रों में ऐरी की राजनीतिक पकड़ उक्रांद की सबसे बड़ी पूंजी रही है।
राज्य गठन के बाद का ‘स्वर्णकाल’ और ‘किंगमेकर’ की भूमिका
9 नवंबर 2000 को जब देश के नक्शे पर उत्तराखंड का उदय हुआ, तो स्वाभाविक रूप से यह उम्मीद जताई जा रही थी कि राज्य आंदोलन की अगुआ पार्टी होने के नाते जनता UKD को सिर-आंखों पर बिठाएगी। शुरुआत में ऐसा दिखा भी।
साल 2002 के पहले विधानसभा चुनाव में UKD ने 4 सीटें जीतकर राज्य की तीसरी सबसे बड़ी राजनीतिक शक्ति के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। इसके बाद 2007 के चुनावों में पार्टी ने 3 सीटें जीतीं। यह वह दौर था जब भाजपा पूर्ण बहुमत से महज एक सीट दूर रह गई थी और UKD के समर्थन से ही सरकार बनी। उस समय राजनीतिक विश्लेषकों को लगा था कि UKD आने वाले समय में उत्तराखंड की “किंगमेकर” पार्टी बनकर उभरेगी।
फिर कैसे शुरू हुआ क्षेत्रीय अस्मिता की आवाज का पतन?
UKD का सबसे बड़ा संकट राज्य गठन के ठीक बाद ही शुरू हो गया था। दरअसल, जब तक अलग राज्य की मांग थी, तब तक पार्टी के पास एक बेहद स्पष्ट और भावनात्मक मुद्दा था। लेकिन राज्य बनते ही पार्टी यह तय नहीं कर पाई कि शासन और प्रशासन चलाने का उसका वैकल्पिक मॉडल क्या होगा। इसके पतन के पीछे मुख्य रूप से चार कारण जिम्मेदार रहे:
- लगातार टूट और गुटबाजी: UKD शायद राज्य की सबसे ज्यादा विभाजित होने वाली पार्टी रही। नेताओं के व्यक्तिगत अहम और मतभेदों के कारण समय-समय पर UKD (पंवार), UKD (डेमोक्रेटिक) जैसे कई धड़े बने, जिसने इसके जमीनी कैडर और जनता के भरोसे को तोड़ दिया।
- राष्ट्रीय दलों का तेजी से विस्तार: राज्य बनते ही भाजपा और कांग्रेस ने संगठनात्मक रूप से पहाड़ के सुदूर इलाकों तक अपनी जड़ें मजबूत कर लीं। UKD के कई कद्दावर नेता और चेहरा समय-समय पर इन राष्ट्रीय दलों में शामिल होते गए, जिससे पार्टी नेतृत्व विहीन होती चली गई।
- संसाधनों की भारी कमी: कॉरपोरेट फंडिंग और बड़े संसाधनों से लैस राष्ट्रीय दलों के सामने UKD हमेशा एक सीमित दायरे और कम बजट वाली पार्टी बनी रही। चुनाव दर चुनाव इसके पास प्रचार और संगठन विस्तार के लिए धन की कमी साफ खलती रही।
- भौगोलिक असंतुलन: UKD कभी भी पूरे उत्तराखंड में समान रूप से मजबूत नहीं हो सकी। कुमाऊं के डीडीहाट, धारचूला, पिथौरागढ़ और बागेश्वर तथा गढ़वाल के पौड़ी, श्रीनगर और टिहरी जैसे पहाड़ी इलाकों में तो इसका प्रभाव रहा, लेकिन हरिद्वार और ऊधम सिंह नगर जैसे मैदानी जिलों में यह कभी पैर नहीं जमा पाई। मैदानों की जातीय और राष्ट्रीय राजनीति क्षेत्रीय अस्मिता के मुद्दे पर भारी पड़ गई।
वर्तमान स्थिति और भविष्य की राह: क्या 2027 में होगी वापसी?
साल 2022 के विधानसभा चुनाव में UKD को एक भी सीट नसीब नहीं हुई, हालांकि उसे करीब 4.8 प्रतिशत वोट जरूर मिले। यह आंकड़ा साफ करता है कि राज्य में आज भी उक्रांद का एक कोर वोटर मौजूद है, लेकिन पार्टी उसे सीटों में तब्दील करने की सांगठनिक क्षमता खो चुकी है। आज सबसे बड़ी चुनौती यह भी है कि जिस ‘उत्तराखंडी अस्मिता’ की राजनीति पर इस दल का जन्म हुआ था, उसे भाजपा और कांग्रेस दोनों ने अपने एजेंडे में शामिल कर लिया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि उक्रांद को खुद को पुनर्जीवित करना है, तो उसे केवल ‘आंदोलन की विरासत’ के भरोसे बैठना छोड़ना होगा। उत्तराखंड की सियासत में आज भी क्षेत्रीय मुद्दों के लिए एक बड़ा स्पेस खाली है।
अगर पार्टी सख्त भू-कानून, मूल निवास (1950 कट-ऑफ), पहाड़ों से पलायन, स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार, पर्यावरण संरक्षण और गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने जैसे मुद्दों पर मुखर होकर सड़कों पर उतरती है, तो वह जनता के बीच अपनी खोई हुई साख वापस पा सकती है।
उत्तराखंड क्रांति दल का इतिहास केवल एक राजनीतिक दल का सफरनामा नहीं है, बल्कि यह देवभूमि के अस्तित्व में आने की जीवंत गाथा है। भले ही यह पार्टी सत्ता की रेस में पिछड़ गई हो, लेकिन आज भी जब-जब उत्तराखंड में पहाड़ बनाम मैदान, जल-जंगल-जमीन पर अधिकार या क्षेत्रीय स्वाभिमान की बहस छिड़ती है, तो यह साफ हो जाता है कि UKD भले ही चुनावी रूप से कमजोर हो गई हो, लेकिन उसकी वैचारिक विरासत आज भी उत्तराखंड की आत्मा में जीवित है।




