उत्तर प्रदेश की राजनीति में जब योगी आदित्यनाथ का नाम लिया जाता है, तो सबसे पहले कानून व्यवस्था, अपराधियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई और प्रशासनिक फैसलों की चर्चा होती है। लेकिन किसी भी सरकार की सबसे बड़ी सफलता केवल उन निर्णयों से नहीं मापी जाती जो सुर्खियां बनते हैं, बल्कि उन बदलावों से मापी जाती है जो आम लोगों के जीवन को सुरक्षित और बेहतर बनाते हैं। पूर्वांचल में इन्सेफेलाइटिस अर्थात दिमागी बुखार के खिलाफ लड़ी गई लड़ाई ऐसा ही एक उदाहरण है।
कभी पूर्वी उत्तर प्रदेश का मानसून लोगों के लिए खुशियों से अधिक भय लेकर आता था। बारिश शुरू होते ही गोरखपुर, कुशीनगर, महाराजगंज, देवरिया, सिद्धार्थनगर, बस्ती और संतकबीरनगर जैसे जिलों में दिमागी बुखार के मामले बढ़ने लगते थे। अस्पतालों में मरीजों की भीड़ उमड़ पड़ती थी और सैकड़ों परिवार अपने बच्चों को बचाने के लिए संघर्ष करते दिखाई देते थे। विभिन्न सरकारी और स्वास्थ्य अध्ययनों के अनुसार पिछले तीन से चार दशकों में इन्सेफेलाइटिस ने पूर्वांचल में 50,000 से अधिक बच्चों की जान ली। एक समय ऐसा भी था जब देश में दर्ज होने वाले कुल इन्सेफेलाइटिस मामलों का लगभग 75 प्रतिशत अकेले उत्तर प्रदेश से आता था।
यह केवल एक बीमारी नहीं थी, बल्कि गरीब परिवारों के लिए एक ऐसी त्रासदी थी जो हर वर्ष दोहराई जाती थी। दूरदराज के गांवों से माता पिता अपने बीमार बच्चों को लेकर घंटों का सफर तय करके गोरखपुर के अस्पतालों तक पहुंचते थे। स्वास्थ्य सुविधाओं का अधिकांश बोझ कुछ चुनिंदा अस्पतालों पर था, जिसके कारण हर वर्ष व्यवस्था पर भारी दबाव पड़ता था।
इस संकट का सबसे भयावह रूप वर्ष 2005 में देखने को मिला। उस वर्ष सात प्रमुख जिलों में 5,737 मामले दर्ज हुए और 1,344 बच्चों की मृत्यु हो गई। इसके बाद भी वर्षों तक स्थिति में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया। धीरे धीरे यह मान लिया गया कि दिमागी बुखार पूर्वांचल की एक स्थायी समस्या है, जिसे पूरी तरह समाप्त करना संभव नहीं है।
साल 2017 में जब योगी आदित्यनाथ ने मुख्यमंत्री पद संभाला, तब यह संकट अब भी गंभीर रूप में मौजूद था। उस वर्ष प्रमुख अस्पतालों में 3,692 मरीज भर्ती हुए और 556 मौतें दर्ज की गईं। अकेले गोरखपुर जिले में AES के 764 मामले सामने आए थे। उसी वर्ष बीआरडी मेडिकल कॉलेज की घटना ने इस समस्या को राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में ला दिया।
यहीं से बदलाव की शुरुआत हुई। सरकार ने इस समस्या को केवल स्वास्थ्य विभाग का विषय मानने के बजाय इसे बहुस्तरीय चुनौती के रूप में देखा। यह समझा गया कि बीमारी के पीछे दूषित जल, खराब स्वच्छता, कुपोषण, अपर्याप्त टीकाकरण और जागरूकता की कमी जैसे कई कारण हैं। इसलिए समाधान भी व्यापक होना चाहिए।
सरकार ने बड़े स्तर पर टीकाकरण अभियान चलाया। वर्ष 2018 में लगभग 88 लाख बच्चों को जापानी इन्सेफेलाइटिस के खिलाफ टीका लगाया गया। स्वास्थ्य विभाग, आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और स्थानीय प्रशासन को इस अभियान से जोड़ा गया। इसके साथ ही गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज में सुविधाओं का विस्तार किया गया और बैकअप ऑक्सीजन क्षमता को लगभग 20,000 लीटर से बढ़ाकर 70,000 लीटर तक किया गया।
उपचार व्यवस्था को भी स्थानीय स्तर तक पहुंचाने का प्रयास किया गया। पहले अधिकांश मरीजों को गोरखपुर रेफर करना पड़ता था, लेकिन बाद में गोरखपुर मंडल और आसपास के क्षेत्रों में 12 से अधिक पीडियाट्रिक आईसीयू तथा मिनी पीआईसीयू इकाइयों की स्थापना की गई। जिला अस्पतालों और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में भी विशेष सुविधाएं विकसित की गईं ताकि मरीजों को समय पर उपचार मिल सके।
इसके साथ संचारी रोग नियंत्रण अभियान और दस्तक अभियान को भी तेज किया गया। स्वास्थ्य कार्यकर्ता घर घर जाकर लोगों को बीमारी के लक्षणों, बचाव के उपायों और समय पर उपचार के महत्व के बारे में जागरूक करने लगे। मुख्यमंत्री स्तर पर नियमित समीक्षा बैठकों ने सुनिश्चित किया कि अभियान केवल कागजों तक सीमित न रहे, बल्कि जमीन पर परिणाम भी दिखाई दें।
इन प्रयासों का असर जल्द ही आंकड़ों में दिखाई देने लगा। वर्ष 2018 में भर्ती मरीजों की संख्या घटकर लगभग 1,660 रह गई और मौतें 556 से घटकर 186 हो गईं। अर्थात केवल एक वर्ष में मामलों में लगभग 55 प्रतिशत और मौतों में 66 प्रतिशत की कमी दर्ज हुई। वर्ष 2019 तक स्थिति और बेहतर हुई तथा अगस्त 2019 तक केवल 389 मरीज भर्ती हुए और 35 मौतें दर्ज की गईं।
बाद के वर्षों में यह सुधार लगातार जारी रहा। ICMR, AIIMS गोरखपुर और राष्ट्रीय विषाणु विज्ञान संस्थान के शोधों के अनुसार वर्ष 2021 तक 2017 की तुलना में AES से होने वाली मौतों में लगभग 90 प्रतिशत और जापानी इन्सेफेलाइटिस से होने वाली मौतों में लगभग 95 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई। कुल AES मामलों में लगभग 65 प्रतिशत तथा JE मामलों में लगभग 78 प्रतिशत की गिरावट आई। जापानी इन्सेफेलाइटिस की पॉजिटिविटी दर 2018 के 11.25 प्रतिशत से घटकर 2022 में लगभग 2.91 प्रतिशत रह गई।
आज स्थिति यह है कि गोरखपुर में AES के मामले 2017 के 764 से घटकर 2024 में केवल 47 रह गए हैं। सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि AES और JE से होने वाली मृत्यु दर शून्य या शून्य के निकट पहुंच गई है। जिस बीमारी ने कभी पूरे पूर्वांचल को भय और असुरक्षा के वातावरण में जीने पर मजबूर कर दिया था, वह आज नियंत्रण में दिखाई देती है।
निश्चित रूप से यह सफलता किसी एक योजना या किसी एक विभाग का परिणाम नहीं है। इसके पीछे स्वास्थ्य कर्मियों, प्रशासन, स्थानीय निकायों, चिकित्सा संस्थानों और समाज के विभिन्न वर्गों का योगदान है। लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि ऐसे व्यापक परिवर्तन के लिए शीर्ष नेतृत्व की स्पष्ट प्राथमिकता और निरंतर निगरानी आवश्यक होती है।
पूर्वांचल में दिमागी बुखार के खिलाफ यह लड़ाई केवल आंकड़ों की कहानी नहीं है। यह उन हजारों परिवारों की कहानी है, जिनके बच्चों का जीवन बचा। यह उस बदलाव की कहानी है जिसने 2005 में 1,344 मौतों वाले भयावह दौर से निकलकर 2024 में लगभग शून्य मृत्यु दर तक का सफर तय किया। और यही कारण है कि उत्तर प्रदेश के पिछले दशक की सबसे महत्वपूर्ण प्रशासनिक उपलब्धियों में इन्सेफेलाइटिस पर नियंत्रण को प्रमुख स्थान दिया जाता है।




